राजकीय सम्मान के साथ शहीद कर्नल संतोष की अंतिम विदाई

पुणे। जम्मू कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में नियंत्रण रेखा के नजदीक आतंकवादियों से लड़ते हुए अपने प्राण न्यौछावर करने वाले कर्नल संतोष महादिक का गुरुवार को उनके पैतृक गांव में पूर्ण सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। इस दौरान सैकड़ों लोग मौजूद थे जिन्होंने शहीद को अश्रुपूर्ण विदाई दी।

महादिक 39 साल के थे। उनका पार्थिव शरीर गुरुवार सुबह महाराष्ट्र के सतारा जिले के पोगरवाड़ी गांव लाया गया, जहां उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। शव को कुछ देर के लिए पास के आराय गांव में स्थित उनकी मां के घर में रखा गया जहां रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।

शहीद को अंतिम विदाई देने के लिए सैकड़ों की संख्या में लोग एकत्र हुए। शोकाकुल ग्रामीणों ने नम आंखों से अपने बेटे को विदाई दी। ये लोग ‘कर्नल महादिक अमर रहे..’ जैसे नारे लगा रहे थे। इससे पूर्व तिरंगे में लिपटा उनका पार्थिव शरीर सेनाकर्मियों के पहरे में जुलूस के रूप में लाया गया।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस ने कर्नल महादिक को बीती रात पुणे में उस समय श्रद्धांजलि दी जब शहीद का पार्थिव शरीर सतारा जिले स्थित उनके पैतक गांव लाए जाने के दौरान पुणे पहुंचा। 41 राष्ट्रीय राइफल्स के कमांडिंग अफसर कर्नल महादिक कश्मीर के कुपवाड़ा में नियंत्रण रेखा के नजदीक मंगलवार को हाजी नाका वन क्षेत्र में एक अभियान के दौरान गंभीर रूप से घायल हो गए थे। बाद में अस्पताल में उनका निधन हो गया।

विशिष्ट 21 पैरा स्पेशल फोर्सेज यूनिट के अधिकारी कर्नल महादिक को 2003 में पूर्वोत्तर में अभियान राइनो में वीरता प्रदर्शन के लिए सेना पदक मिला था। सतारा के पोगरवाडी गांव में जन्मे महादिक की सैन्यकर्मी बनने की यात्रा तब शुरू हुई जब उन्होंने 1987 में छठी कक्षा में सैनिक स्कूल में प्रवेश लिया और बाद में वह सेना में भर्ती हो गए। उनके पिता दर्जी और भाई दूधिया थे। कर्नल महादिक के परिवार में पत्नी और दो बच्चे हैं जो अंतिम संस्कार के समय मौजूद थे।

उनके करीबी मित्रों के अनुसार कर्नल महादिक हमेशा सर्वोच्च बलिदान देने की बात करते थे। उनके सहपाठियों में से एक (जो सेना में है) ने कहा, स्वभाव से शांत और व्यवहार में उदार महादिक के दिल में तूफान भरा था। उनके मित्रों का कहना है कि महादिक बेहतरीन फुटबॉल गोलकीपर, कुशल घुड़सवार, जुनूनी बॉक्सर और ऑल राउंडर थे। आतंक रोधी बल 41 राष्ट्रीय राइफल्स के कमांडिंग अफसर महादिक के बारे में उनके सहकर्मियों का कहना है कि वह बहुत बहादुर थे और हमेशा आगे रहकर नेतृत्व करते थे।

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