इंडिया, पाक में ‘मंटो’ अधिक प्रासंगिक’

कोलकाता। समीक्षकों द्वारा फिल्म ‘मंटो’ को मिल रही अच्छी प्रतिक्रिया के बीच निर्देशक सरमद सुल्तान खूसट और अभिनेत्री निमरा बूचा ने कहा है कि पाकिस्तानी लेखक के अशांत जीवन का सिनेमाई चित्रण आज अधिक प्रासंगिक है, क्योंकि भारत और पाकिस्तान में इस समय बोलने की स्वतंत्रता नहीं है।

‘मंटो’ पाकिस्तानी लघु कथाकार सआदत हसन मंटो के जीवन पर आधारित 2015 की एक नाटकीय फिल्म है। निमरा बूचा ने रविवार को यहां 21वें कोलकाता अंर्तराष्ट्रीय फिल्म समारोह में संवाददाताओं से कहा, “सच यह है कि उनका जीवन परेशानी से भरा था। उन्हें भुगतान नहीं किया जाता था और उनके कृतियों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।

ये सारी चीजें हमारे आज के जीवन को परिलक्षित करती हैं। जिस तरीके से हम कलाकारों और उनकी कृतियों के साथ व्यवहार करते हैं, हमारे देशों में अभिव्यक्ति की आजादी आसान नहीं है।” ‘मंटो’ पाकिस्तान में हिट हो चुकी है और अमेरिका के विभिन्न विश्वविद्यालयों में इसे दिखाया जा रहा है।

निर्देशक सरमद ने मंटो को इस उपमहाद्वीप की विरासत बताया और कहा कि मंटो हमेशा अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में खड़े हैं। सरमद ने ही इस फिल्म में मंटो का किरदार निभाया है। खूसट ने यह भी कहा कि शुरू में वह भारत आने से डरे हुए थे, क्योंकि मीडिया रपटों में भारत में असहिष्णुता की कहानियां पटी हुई थीं।

उन्होंने कहा, “लेकिन इस शहर में मैं जब से आया हूं, मैं बहुत खुश हूं। अब मुझे यहां डर नहीं लग रहा है।” वहीं बूचा ने कहा कि सामान्य रूप से यह उन कलाकारों के लिए निराशा का समय है, जो सच बोलना चाहते हैं। फिल्म ‘मंटो’ के निर्माता बाबर जावेद हैं और इसके लेखक शाहिद नदीम हैं। इसकी पटकथा मंटो की लघु कहानियों, खासतौर से ठंढा गोश्त, मदारी और अन्य पर आधारित है।

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