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बड़े चेहरों को लेकर NDA में कशमकश, इस कारण फंसा है मामला

सीटों को लेकर राष्‍ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सहयोगी दलों में मामला अभी तक सुलझ नहीं सका है। कई संभावित चेहरों को बदलने के दबाव के कारण भी पेंच फंस गया है। एनडीए के नेता बीती रात तक दिल्ली में इस गुत्थी को सुलझाने में लगे रहे। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) प्रदेश चुनाव समिति की बैठक आज पार्टी मुख्यालय में हो रही है। बैठक में बिहार के भाजपा प्रभारी भूपेंद्र यादव शामिल हैं।

सूत्रों के अनुसार पिछले लोकसभा चुनाव में 30 सीटों पर चुनाव लडऩे वाली भाजपा की अभी तक एक दर्जन सीटें ही ऐसी है जहां से उसका चुनाव लडऩा लगभग तय है। ये सीटें हैं- बेतिया, मोतिहारी, मुजफ्फरपुर, छपरा, उजियारपुर, मधुबनी, अररिया, पटना साहिब, सासाराम, बेगूसराय और गया। अन्य सीटों पर जदयू और लोजपा की दावेदारी के कारण मामला अटका हुआ है।

मिथिलांचल में दरभंगा सीट को लेकर भी मामला फंसा है। जनता दल यूनाइटेड (जदयू) संजय झा के लिए यह सीट मांग रहा है। भाजपा के लिए यह हमेशा से ही प्रतिष्ठा की सीट रही है। उत्तर बिहार में आरएसएस की गतिविधियों का संचालन यहीं से होता है। ऐसे भी 1996 में जदयू से गठबंधन के बाद से लगातार  भाजपा यहां से चुनाव लड़ते रही है। यही स्थिति नवादा की है। नवादा में तो भाजपा जनसंघ काल से ही चुनाव जीतते रही है।

खगडिय़ा सीट लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) की सिटिंग है। भाजपा यह सीट सम्राट चौधरी के लिए मांग रही है। भाजपा के लिए समस्या है कि उसके पास कुशवाहा को चुनाव लड़ाने के लिए कोई सीट नहीं बच रही है। इसी तरह सिवान, गोपालगंज, पाटिलपुत्र, आरा और बक्सर सीट को लेकर जदयू से सहमति नहीं बन पा रही है।

एक समस्या राज्य की अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित छह सीटों को लेकर है। फिलहाल तीन पर लोजपा और तीन पर भाजपा का कब्जा है। जदयू इसी आधार पर कम से कम एक आरक्षित सीट गोपालगंज पर दावा कर रही है। चर्चा है कि जदयू की ओर से भाजपा के कुछ संभावित प्रत्याशियों के नाम को लेकर जहां सवाल उठाए जा रहे हैं, वहीं भाजपा ने भी जदयू के एक सिटिंग सांसद के जीत की संभावना पर सवाल उठा दिया है।

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