छत्तीसगढ़ के ‘गोदना’ को मिली अंतर्राष्ट्रीय पहचान

नई दिल्ली। छत्तीसगढ़ की ‘गोदना’ कला का आज की तारीख में कोई मुकाबला नहीं है। आज का आधुनिक टैटू इसी पुरानी कला का नया अंदाज है। पुराने जमाने में आदिवासी तबके के लोग इसे अपने पूरे शरीर में गुदवाते थे, लेकिन अब इस कला को कपड़े पर उतारा जाता है।

साड़ियों व कपड़े पर बनने वाली गोदना कला पहले काफी सीमित थी, घर में उपयोग में आने वाली चीजों सहित अपने पहनने के कपड़ों पर गोदना कला का उपयोग होता था। छत्तीसगढ़ हस्तशिल्प विकास बोर्ड ने इस कला से जुड़े कलाकारों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराया है। सरगुजा के गोदना आर्ट की पहचान अब विदेशों तक हो गई है।

गोदना कला का प्रचार कर कलाकारों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराने, उत्सव एवं मेलों में प्रतिनिधित्व करने का मौका दिया गया।  इन दिनों भारत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेले में स्टाल नंबर दो पर छत्तीसगढ़ की गोदना कला लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।

दिल्ली के युवा छत्तीसगढ़ के स्टाल में शरीर पर उकेरने वाले टैटू को साड़ी पर गोदना कला के नाम से बनता देख कर काफी उत्साहित नजर आ रहे हैं। व्यापार मेले में गोदना कला का यह कार्य छत्तीसगढ़ के अम्बिकापुर और जशपुर जिले से आई आदिवासी महिलाओं द्वारा बखूबी किया जा रहा है।

छत्तीसगढ़ की गोदना कलाकार रामकली पावले अंबिकापुर जिले से है। उन्होंने बताया कि व्यापार मेले में अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है। साड़ियों पर गोदना कला के द्वारा चित्रकारी करना काफी मेहनत का कार्य है। अब तक उन्होंने लगभग 60 हजार रुपये तक की गोदना साड़ियां बेच दी हैं।

अब गोदना कला एक ब्रांड के रूप में स्थापित हो चुकी है। महानगरों में इसकी काफी मांग है। जशपुर जिले से आई गोदना कलाकार सीमा भगत ने बताया कि युवा उनके बनाए गए स्टॉल-शॉल को काफी पसंद कर रहे हैं। उनके पास इस मेले में चादर, टेबल कवर, साड़ी आदि हैं। साड़ियां 10 हजार रुपये तक की कीमत की हैं।

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