एक नजर, यूपी में बालश्रम की स्थिति एवं बच्चों के अधिकार

नई दिल्ली| बचपन, इंसान की जिन्दगी का सबसे हसीन पल होता है, न किसी बात की चिन्ता और न ही कोई जिम्मेदारी। बस हर समय अपनी मस्तियों में खोये रहना, खेलना-कूदना और पढना, लेकिन सभी का बचपन ऐसा हो यह जरूरी नहीं। गरीबी, लाचारी और सामाजिक वंचना तथा लिंग, जाति व धर्म आधारित भेदभाव के चलते हमारे बच्चे कापी- किताबों और दोस्तों से दूर होटलों घरों, उद्योगों में घरों में किए जाने वाले कार्यो में औजारों और झाडू पोंछे के बीच अपना जीवन बिताने के लिए मजबूर है।

भारतीय समाज में कमोबेश बाल अधिकार व बाल श्रम एक ही सिक्के के दो पहलू है। बाल अधिकारों पर चर्चा करते हुए प्रमुखता से बाल श्रम पर बातचीत शुरू हो जाती है, लेकिन बाल श्रम एक स्थिति है और बाल अधिकार बच्चों के बुनियादी हक़ और हुकूक से जुड़ी आधुनिक समाज की देन है। भारत में कुल कामकाजी बच्चों में आधे से अधिक बच्चे भारत के 5 राज्यों से आते है जिसमें से उत्तर प्रदेश एक प्रमुख राज्य है। 2011-12 की यूनिसेफ रिर्पोट के अनुसार रेस्क्यू किए गए बाल श्रमिकों में से सबसे अधिक उत्तर प्रदेश से है।

बाल श्रम बच्चों के अधिकारों की सीमा के उल्लंघन की एक ठोस अभिव्यक्ति है, और भारत में इसे एक गंभीर और जटिल सामाजिक समस्या के रूप में मान्यता प्राप्त है। कामकाजी बच्चे सभी अधिकारों, चाहे वह शिक्षा प्राप्त करने का हो, भरपेट भोजन प्राप्त करने का हो, उचित चिकीत्सीय सुबिधायें प्राप्त करने का हो या फिर खेलने या भरपूर प्यार, सम्मान और आदर प्राप्त करने का हो उन सभी अधिकारों की वंचना का शिकार होते है जो कि उन्हें एक स्वस्थ्य नागरिक बनाने में मददगार साबित हो सकते हैं। शिक्षा का अधिकार कानून व साक्षरता दर में वृद्धि के बावजूद बाल श्रम एक महत्वपूर्ण घटना के तौर पर जारी है।

बाल श्रम में धारा 1986 के अनुसार 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों का 18 प्रकार के व्यवसाय व  65 कार्य की प्रक्रियाओं में काम करना वर्जित था जिसमें घरेलू कार्य भी शामिल था। वर्ष 2012 में इस कानून में संशोधन किया गया जिसके तहत सभी प्रकार के बाल श्रम पर तो रोक है पर घरेलु कार्यों में लगे बच्चों पर कोई रोक नहीं है जिसके कारण बच्चे विद्यालय जाने के बजाए अपने माता पिता के साथ ऐसे कार्यो में संलग्न है जिन्हें हम सभी होम बेस्ड वर्क के नाम से जानते है जैसे घर पर बीडी बनाने, कढाई करना, दरदोजी  इत्यादि।

संगठित उद्योगों में किए जाने वाले कार्यो का लगातार असंगठित क्षे़त्र में हस्तान्तरण का सबसे बड़ा दुष्परिणम यह है कि 2001 से 2011 के बीच शहरी क्षेत्रों में बाल श्रम 5.3 % बढा है और उत्तर प्रदेश के स्तर पर देखें तो पिछले दशक में 13 % की बढोत्तरी दिखायी देती है अर्थात भारत में काम करने वाले  हर 5 वें बच्चे में से एक बच्चा उत्तर प्रदेश से है।

बाल श्रम गरीबी एवं शिक्षा और प्रशिक्षण का कारण और परिणाम दोनों है, इस कुचक्र को तोडने के लिए जरूरी है कि कमजोर श्रम बाजार संस्थानों, अपर्याप्त कानूनों व कानूनों की कमजोर व्याखयायें संशोधित करते हुए उनकी शिक्षा व दक्षताओं के संवर्द्धन हेतु ठोस पहल की जाए। संस्थानों में बाल अधिकारों की व्यापक समझ के अभावों के चलते विभिन्न सामाजिक व मानवीय भूलों के चलते बच्चे शाला से दूर शोषण व उपेक्षा का शिकार हो जाते है, लगातार उत्पादन की प्रक्रिया से जुड़े कार्यो की आउटसोर्सिंग या फिर उनका घरेलु उद्योगों में तब्दील हो जाना बाल श्रम को बढाने वा बाल अधिकारों के उल्लंघन की ठोस परिस्थितियां पैदा कर देता है, जों कि सम्मान व आदर के साथ कार्य करने की स्थितियों में सबसे बडी बाधा है।

गरीबी तथा प्राकृतिक एवं मानव निर्मित आपदाओं के चलते होने वाले पलायन एवं बाल अधिकारों के प्रति सामाजिक असंवेदनशीलता तथा सुविधायुक्त बाजार सम्बन्धी कानूनों के चलते समाज में लगातार बढती आर्थिक गैर बराबरी ने न सिर्फ उत्तर प्रदेश में बल्कि पूरे भारत में अवसरों को सीमित कर दिया है। शाला से दूर ऐसे बच्चे जो दिखने में तो अपने माता-निता के कार्यो में हाॅथ बंटाते  दिखते है, वह वास्तव में एक नए प्रकार के बाल श्रमिकों की कडी में सिर्फ इजाफा  ही कर रहे है।

बच्चे मानवता के लिए सबसे बड़ा उपहार है, जो कि किसी भी समाज के भविष्य के विकास की क्षमता रखते हैं। हर देश अपने बच्चों की वर्तमान स्थिति के साथ अपने भविष्य को जोड़ता है। राष्ट्र के बेहतर भविष्य के लिए जरूरी है कि हमारे बच्चों के आस- पास का वातावरण उनके बौद्धिक, भौतिक, और सामाजिक स्वास्थ्य के लिए अनुकूल हो और उन्हें भेदभाव रहित समाज में पलने व बढने का मौका मिले जिससे वह भविष्य में समाज के जिम्मेदार उत्पादक सदस्य के रूप में अपना योगदान सुनिश्चित कर सकें। इस पूरी समस्या का दुखद पहलू यह है कि हमारे बच्चे शिक्षा की कीमत पर काम करने के लिए मजबूर है जिससे भविष्य के अन्दर पैदा होने वाले अवसरों की गैर बराबरी की नींव उनके बालपन में ही पड जाती है और वह स्वाभाभिक रूप से वंचना व शोषण का शिकार हो जाते है।

Powered by themekiller.com anime4online.com animextoon.com apk4phone.com tengag.com moviekillers.com