इंदिरा की हत्या ने रद्द करा दी थी भारत-पाक सीरीज

नई दिल्ली| आज 31 अक्टूबर है। यह तारीख भारतीयों को मिश्रित अनुभूति देता है। एक ओर हैं देश को एकता के सूत्र पिरोने वाले लौह पुरुष सरदार पटेल, जिनका कि आज जन्मदिन है और जिसे यादगार बना दिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में एकता दौड़ के आयोजन से तो दूसरी ओर आज ही इंदिरा गांधी का शहादत दिवस भी है।

पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी की राजनीतिक अवधारणा और कार्य शैली को लेकर भले ही आप लम्बी बहस कर सकते हैं, मगर एक महिला होने के बावजूद उनको हमें आंख मूंद कर निर्विवाद दुर्जेय योद्धा की संज्ञा भी देनी होगी। बीते एक हजार साल के दौरान महाराजा रणजीत सिंह (काबुल विजय ) के बाद देश की इस प्रथम प्रधानमंत्री को ही हम उस सफल सेनानायक के रूप में स्मरण करते रहेंगे, जिसने देश को अंतर्राष्ट्रीय जीत से नवाजा और पूर्वी पाकिस्तान को मानचित्र से ही गायब कर दिया। अपने अंगरक्षकों की गोलियों का शिकार हुईं श्रीमती गांधी की हत्या, उसका कारण, उससे देश में उपजा रोष और भड़के दंगे की चर्चा करना मुख्य उद्देश्य नहीं है।

बहुतेरों को शायद विस्मृत हो गया होगा कि जिस दिन इंदिरा जी की सुबह हत्या हुई, सुनील गावस्कर की अगुवाई में भारतीय क्रिकेट टीम पाकिस्तान भ्रमण के दौरान सियालकोट में पाकिस्तान के साथ एक दिनी मैच खेल रही थी। बतौर पत्रकार उस समय मैं भी टीम के साथ था और इसी परिप्रेक्ष्य में यहां चर्चा होगी। इंडो-पाक दौत्य सम्बन्धों में आई भयानक गिरावट, सियालकोट में भारतीय मीडिया की नजरबंदी, हत्या के बाद पाकिस्तानियों के हैरतअंगेज रूप से बदले तेवर, वाघा बार्डर से मेरा भारत में प्रवेश, पंजाब के भयावह हालात और काफी मुश्किल से घर वापसी आदि मेरी यादों में जस की तस जीवित हैं। चलिए यादों को कुरेदते हैं|

आणविक प्रतिष्ठानों पर भारतीय हमले की खबर से पाक दहशत में ..!!

इतिहास गवाह है कि भारत-पाक क्रिकेट सम्बन्ध दरअसल दोनों देशों के तत्कालीन कूटनीतिक रिश्तों पर ही निर्भर करते रहे है। 1961-62 की भारत में घरेलू सीरीज के बाद दोनों मुल्कों ने कमश: दो युद्ध लड़े 1965 और 1971 मे। जाहिर है कि इस दौरान दोनों देशों के बीच खेल गतिविधियां ही ठप नहीं रहीं बल्कि बात तो दुश्मनी की हद तक उस समय पहुंच चुकी थीं जब क्रिकेटर कारदार ने, जो दोनों देशों का प्रतिनिधत्व कर चुके थे, यह धमकी दे डाली थी कि यदि विश्व कप हाकी में भारतीय टीम ने शिरकत की तो पाकिस्तान की गलियों में खून बहेगा।

इसके चलते पाक मेजबानी से हट गया और इसका आयोजन मलेशिया में किया गया जहाँ, भारत ने इसी पाकिस्तान को हरा कर हाकी विश्व कप अपने नाम किया था। मगर तिकडमी तानाशाह सैन्य शासक जियाउल हक दूरगामी षडयंत्र के तहत तत्कालीन जनता पार्टी के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को झांसे में लेने में सफल रहे और 16 वर्षों बाद दोनों देशों में क्रिकेट संबंधों की बहाली हो गयी। इसी के तहत 1978 में भारतीय टीम पाकिस्तान दौरे पर गयी जहां उसका शाही खैर मकदम हुआ था।

मगर 1982-83की सीरीज में रिश्तों में वह गर्माहट गायब हो चुकी थी और 1984 का दौरा किसी बुरे ख्वाब की मानिंद था। इसलिए नहीं कि बीच में ही श्रीमती गाँधी की हत्या हो गयी थी, बल्कि इसलिए भी कि तब भारतीय प्रतिनिधिमंडल को पाकिस्तानी प्रशासन भेदियों के रूप में ले रहा था। इसका अहसास पाकिस्तानी धरती पर कदम रखते ही हमें हो चुका था।

वो तमाम पाकिस्तानी साथी और पत्रकार जो साये की तरह कभी साथ होते थे, कटे-कटे से नजर आए। अपने बेवाक बयानों के लिए मशहूर और भारतीय पत्रकारों में बडबोले तत्कालीन भारतीय राजनीतिज्ञ राजनारायण के नाम से जाने जाने वाले तेज गेंदबाज सरफराज नवाज भी जिया के डंडे से डर कर हमारे पास रात के अंधरे में छिप कर आए और तब पता चला हमें कि आखिर माजरा क्या है।

इसकी पुष्टि बाद में पाकिस्तानी शहाफियों ने भी की। उन सभी ने बताया कि कुछ दिनों पहले पूरे पाकिस्तान में इस खबर से दहशत फैल गयी थी कि भारत के जैगुआर विमान पाकिस्तानी आणविक ठिकानो पर हमला करने वाले है। इसका सूत्र उन्हें अमेरिका से मिला था जिसने पहले यह बताया था कि भारतीय जैगुआर अपने बेस से गायब हैं। बाद में अमेरिका ने ही इस आशय की जब पुष्टि करते हुए बताया कि भारतीय विमान अनियमित प्रशिक्षण उड़ान पर थे, तब कहीं जाकर पाकिस्तान ने राहत की सांस ली।

भारतीय शिविर में जबदस्त सौहार्द

यह अभागी अधूरी रद हुई क्रिकेट सीरीज दोनों देशों के आपसी रिश्तों के लिहाज से भले ही दुखद रही हो पर भारतीय प्रतिनिधिमंडल में आपसी सौहार्द गजब का था और जिसकी कमी हमने पिछले दो दौरों में शिद्दत से महसूस की थी। हालांकि इस बार भी टीम मैनेजर शाही खानदान से था, यानी राजसिंह डूंगरपुर थे पर उनमे और पूर्व के दोनों दौरों के मैनेजर रहे भूतपूर्व बडौदा नरेश फतेहसिंह गायकवाड के व्यक्तित्वों में खासा फर्क था, उम्र और स्वभाव दोनों दृष्टि से।

गायकवाड जहां पितृ पुरुष की भूमिका में थे इसलिए उनके और टीम के बीच एक निश्चित दूरी थी। उनके समय में दोनों बार टीम आपस में बंटी हुई थी, जिसकी चर्चा फिर कभी, मगर राज भाई यारों के यार थे एक दम खुले मिजाज के तत्कालीन टीम के खिलाड़ी भी यह स्वीकार करेंगे कि भारतीय प्रतिनिधिमंडल तब एक परिवार सरीखा था और राजभाई की भूमिका संरक्षक की रही।

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