कांग्रेस का यूपी में मास्टर स्टोक

उमेश कुमार
शीला दीक्षित के सहारे यूपी कांग्रेस

लखनऊ। बीते 25 साल यूपी सियासी बनवास झेल रही कांग्रेस को उबारने के लिए हाईकमान में आखिरकार मास्टर स्टोक लगा ही दिया। क्योंकि कांग्रेस के पास यूपी के 11 प्रतिशत ब्राम्हणों को रिझाने के लिए कोई दूसरा चेहरा नहीं था। इसीलिए हाईकमान ने शीला दीक्षित को यूपी के लिए मजबूत चेहरा मानकर मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित किया है।
शीला दीक्षित का नाम निःसंदेह देश की राजनीति में बडा नाम है। क्योंकि वह किसी राज्य की 15 सालों तक मुख्यमंत्री रहने वाली पहली महिला है। वह यूपी की राजनीति से भी जुडी रही है। वह कन्नौज से सांसद भी निर्वाचित हो चुकी है। देश की राजनीति में कमजोर हो रही कांग्रेस की हालत यूपी में करो या मरो जैसी हो गयी है। इसीलिए कांग्रेस ने शीला दीक्षित को उतारा है।

यूपी में करीब 11 प्रतिशत ब्राम्हण मतदाता है। यूपी में फिलहाल इस समाज का कोई सर्वमान्य नेता नहीं है। इसके साथ ही प्रदेश के करीब दो दर्जन जनपदों की करीब 50 सीटों पर यह वोटर निर्णायक है। यह वोट बैंक कभी कांग्रेस का बेस वोट माना जाता था। लेकिन राम मंदिर के आंदोलन के दौरान यह वर्ग भाजपा की ओर चला गया। यूपी में माहौल देख यह वर्ग बीते दो दशक से विधानसभा चुनावों में कभी सपा तो कभी बसपा के साथ जुडा रहा है।
शीला दीक्षित को यूपी का सीएम कंडीडेट बनाये जाने से प्रदेश का ब्राम्हण समाज गर्व महसूश करेगा। अधेड उम्र के लाोग शीला के समर्थन में जुड सकते हैं। लेकिन करीब 65 प्रतिशत युवा वोटर शीला दीक्षित को जानता तक नहीं। इघर बीच शीला दीक्षित की राजनीति दिल्ली तक ही केन्द्रीत होकर रह गयी थी। यूपी से उनका जुडाव कम हो गया था। इस तरह यदि ब्राम्हण मतदाता के वोटों का धुवी्करण हुआ तो कांग्रेस को खास लाभ नहीं होगा। इसके अलावा प्रदेश कांग्रेस में फैली गुटबाजी को खत्म करना भी उनके समक्ष बडी चुनौती होगी। क्योंकि हाई कमान के निर्देश में चुनाव प्रबंधन का काम देख रहे प्रशांत किशोर के क्रियाकलापों पर कुछ कांग्रेसी उंगली उठाने से बाज नहीं आते। इसके अलावा संगठन को बूथ स्तर पर खडा करना भी आसान नहीं होगा। क्योंकि चुनाव के कुछ ही समय बचा है। केन्द्रीय नेतृत्व ने हाल में ही प्रदेश प्रभारी, प्रदेश अध्यक्ष एवं सीएम कंडीडेट का ऐलान किया है।

यूपी से रहा जुडाव
पंजाब में जन्मी 78 वर्षीय शीला दीक्षित की गिनती कांग्रेस के वफादार सिपाहियों में होती है। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा दीक्षा दिल्ली मं ही हुई। लेकिन उनका विवाह उन्नाव के स्वतं़त्रता संग्राम सेनानी उमा शंकर दीक्षित के प्रशासनिक अधिकारी पुत्र विनोद दीक्षित के साथ हुआ था। अब उनके पति नहीं है। यूपी के कनौज सीट से वह 1684 से 1989 तक सांसद रही। इसी दौरान उन्हें केन्द्र में मंत्री भी बनाया गया। 1998 में वह दिल्ली कांग्रेस की अध्यक्ष निर्वाचित हुई। इसी दौरान दिल्लाी विधानसभा के चुनाव हुए जिसमें पार्टी को जोरदार सफलता मिली । इसके साथ ही उन्होंने दिल्ली विधानसभा के तीन चुनावों में जीत की हैट्रिक मारी। इस तरह 1998 से लेकर 2013 तक वह 15 साल ते दिल्ली की मुख्यमंत्री रही। दिल्ली हार के काग्रेस ने उन्हें केरल का राज्यपाल बना दिया। लेकिन केन्द्र में भाजपा की सरकार बनते ही पांच माह के अंदर उन्हें हटा दिया गया

भाजपा के लिए बढी मुसीबत
कांग्रेस द्वारा उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री प्रत्याशी शीला दीक्षित को बनाये जाने के बाद भाजपा के लिए मुसीबत बढ गयी है। क्योंकि भाजपा केन्द्र में मोदी सरकार बनने के बाद से सर्वणों को नजर अंदाज कर पिछडे वर्ग को ही तवज्जों दे रही है। यहां के ब्राम्हण प्रदेश अध्यक्ष डाॅ लक्ष्मीकांत बाजपेयी को हटाकर पार्टी ने केशव प्रसाद मौर्य को कमान सौप दी । इसके अलावा हाल में जो प्रदेश की 41 सदस्यीय कार्य कारिणी घोषित की गयी है उसमें 14 नेता पिछडे वर्ग के ही है। इसी तरह हाल में हुए जिला अध्यक्षो के चुनाव में भी प्रदेश में 44 अध्यक्ष पिछडी जाति के बनाये गए है। इससे यूपी का ब्रम्हण समाज भाजपा से कुछ नाराज चल रहा है इसका लाभ कांग्रेस अब शीला दीक्षित को आगे कर उठा सकती है। वहीं भाजपा के लिए कांग्रेस ने शीला को उतार कर मुसीबत बढा दी है। क्योकि भाजपा ब्राम्हण समाज को अपना मान कर पिछडो से नजदीकियां बढा रही थी।
ऐसे में भाजपा यदि शीला दीक्षित के पुराने विवादों को उछालती है तो उनकी प्रति ब्राम्हणों में सहानुभति बढेगी इसका भाजपा को नुकसान उठाना पडेगा। भाजपा प्रवक्ता हरीश श्रीवास्तव ने बताया कि शीला दीक्षित का अधिकांश समय दिल्ली में बीता उन्होंने वहीं राजनीति की। जब वहां पर वह बुरी तरह हार गयी तो यूपी में क्या करेगी। युपी में उकना कोई खास योगदान नहीं रहा है। इसलिए यूपी की राजनीति में कांग्रेस का उद्धार मुश्किल है।

उछल सकता है टैकर घोटाला
शीला दीक्षित की करीब पांच दशक की राजनीति है। लेकिन आखिर के पाचं साल के दिल्ली के कार्यकाल में उनका नाम एक टैंकर घोटाले में आ गया। यह घोटाला करीब 400 करोड का बताया जा रहा है। इस मामले को दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने तूल देकर मुकदमा भी कायम कराया है। इस मामले की जांच भी चल रही है। यूपी में आम चुनाव के दौरान विरोधी दल का  इसे उछाल कर कांग्रेस के मिशन में अवरोध कर सकते है। ऐसे मे विपक्ष के इस आरोप का हाजिर जवाब देने के लिए भी कांग्रेस को तैयार रहना होगा। तभी ब्राम्हणों का जुडाव कांग्रेस की ओर पुनः हो सकता है। वर्ना इस स्वाभिमानी कौम को कांग्रेस रिझा नहीं पायेगी।

पी के का पैतरा या मजबूरी
काफी समय से कांग्रेस के मुख्यमंत्री प्रत्याशी को लेकर हाईकमान आत्मंमथन कर रहा था। लेकिन आज अंतः यूपी में कांग्रेस के खेवनहार की जिम्मेदारी शीला दीक्षित को सौंप दी। इसके पीछे कांग्रेस की मजबूरी कही जाए या फिर चुनाव प्रबंधन का काम देख रहे प्रशांत किशोर का पैतरा। क्योंकि प्रशांत किशोर अर्से से सर्वणों को आगे बढाने की मांग कर रहे थे। उन्होंने ही हाई कमान को यहां पर सीएम कंडीडेट के लिए शीला दीक्षित का नाम सुझाया था। ऐसी चर्चा कांग्रेस मुख्यालय पर आज रही।

बेहतर टीम के साथ काम करने का मौका
शीला दीक्षित को यूपी में एक बेहतर टीम के साथ काम करने का मौका भी पार्टी हाईकमान ने दिया है। आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर हाईकामन ने यूपी प्रचार समिति का भी गठन किया है। जिसका अध्यक्ष पूर्व केन्द्रीय मंत्री संजय सिंह को बनाया गया है। पूर्व मंत्री
आरपीएन सिंह को उपाध्यक्ष बनाया गया है। इसके अलावा, कांग्रेस ने यूपी के चुनावों के लिए एक संयोजन समिति भी बनाई है, जिसके अध्यक्ष प्रमोद तिवारी होंगे। इस समिति में मोहसिना किदवाई, सलमान खुर्शीद, राजीव शुक्ला, श्रीप्रकाश जायसवाल, रीता बहुगुणा, सलीम शेरवानी और प्रदीप जैन आदित्य, पीएल पुणिया, निर्मल खत्री, प्रदीप माथुर को शामिल किया गया है।

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