ग्लैमर को ईवीएम में कैद करने की चुनौती

राजेश सिंह

राज बब्बर को मिला बेदाग छवि का ईनाम
150 सीटों का लक्ष्य भेदना आसान नहीं

लखनऊ। फिल्मी चकाचैंध से सियासी दुनिया में आए राज बब्बर को बेदाग छवि एवं विनम्रता का लाभ मिल गया। लेकिन उनके समक्ष यूपी में होने जा रहे सियासी दंगल में वालीवुड के ग्लैमर को वोटों में तब्दील करने की बडी चुनौती है। इसके साथ ही उन्हें जातीय तिलिस्म में जकडी सूबे की सियासत को तोडना होगा। जिससे प्रदेश में कांग्रेस के सिमटते जनाधार को बढाया जा सके।

तकरीबन चार दशक तक फिल्मी दुनिया में अपना नाम कमाने वाले राज बब्बर केा कांग्रेस हाईकमान में बडी जिम्मेदारी सौंपी है। क्योंकि यूपी में कांग्रेस के चुनाव प्रबंधन का काम देख रहे प्रशात किशोर ने 2017 के आम चुनाव में पार्टी के लिए करीब 150 सीटों का लक्ष्य तय किया है।

इस लक्ष्य को भेदने के लिए उन्हें पार्टी में चल रही गुटबाजी पर विराम लगाकर विरोधियों को परास्त करने की रणनीति बनानी होगी। आम तौर पर ग्लैमर को देखने के लिए भीड तो खुब जुटती है पर वह वोटों में तब्दील नहीं हो पाती। ऐसे में राज बब्बर को इस भीड को वोटों में परिवर्तित कराने की भी चुनौती है। इसके लिए संगठन को बूथ स्तर मजबूत करना होगा।

संगठन में काम करने का उनके समक्ष कोई खास अनुभव नहीं है। इसके अलावा यहां पर सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, बसपा प्रमुख मायावती से भी मुकाबला करना होगा। राज बब्बर को यूपी के प्रदेष अध्यक्ष का ओहदा उनके ईमानदारी एवं बेदाग छवि के कारण मिला। यह कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के करीबी माने जाते है।

इसीलिए कांग्रेस ने कई दिग्गजों को दरकिनार कर उन्हें उत्तराखण्ड से राज्यसभा सदस्य बना दिया। इसके अलावा वह मुख्यमंत्री की पत्नी डिपंल यादव को फिरोजाबाद से पराजित कर चुके है। सपा में रहकर भी उसके अंदरूनी बातों से भली भांति वाकिब है। इन्हें मुखर वक्ता के रूप में जाना जाता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक पर टिप्पडी कर चुके है।

इसके अलावा प्रदेश के आगरा जनपद में जन्मे राज बब्बर मृदुभाशी होने के साथ ही देश में एक चर्चित चेहरा भी है। यह आगरा से भी कई बार सांसद बन चुके है। लखनऊ से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के समक्ष यह चुनाव लड चुके है। पिछड़ों के इर्द केन्द्रित हो रही प्रदेश की राजनीति को उबार कर सर्वण एवं मुस्लिमों में रूझान पैदा करा होगा।

जिससे चुनाव में कांग्रेस का कल्याण हो चुके है। क्योंकि कांग्रेस का जनाधार बीते तीन दशक से यूपी में लगातार कम होता जा रहा है। इस तरह राज बब्बर कांग्रेस को कितना लाभ दिला पायेंगे यह भविश्य के गर्भ में है।

जातीय संतुलन साधने की कोशिश

कांग्रेस हाईकमान में आगामी विधानसभा चुनाव को देख जातीय संतुलन साधने की कोशिश की है। राज बब्बर स्वयं पिछडी जाति के है लेकिन उनकी पत्नी मुस्लिम समाज से ताल्लुक रखती है। इसी तरह पार्टी ने चार उपाध्यक्ष मनोनीति किये है। इसमें राजा राम पाल यह पाल समाज के है। इस जाति का कोई सर्वमान्य नेता नहीं है।

ऐसे में यह कई जिलों में अपने समाज को कांग्रेस की ओर जोड सकते है। इसके साथ ही राजेश मिश्र ब्राम्हण समाज के है। प्रदेष में करीब नौ प्रतिशत इस वर्ग के मतदाता है। भाजपा से दूर होते इस वर्ग के लोगों को जोडने में मदद मिलेगी।

इसी तरह दलित जाति के भगवती प्रसाद चैधरी को भी उपाध्यक्ष बनाया गया है। इसके जरिये पार्टी दलित वोट बैक में सेंध लगा सकेगी। इमरान मसूद का भी कद बढाया गया है। यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक पर हमला बोल चुके है। इसके जरिये मुस्लिम मतों को जोडा जा सकेगा।

तीन दशक से दहाई में सिमटी कांग्रेस

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मौत के बाद कांग्रेस प्रदेश में 39 प्रतिशत मतों के साथ 269 सीटों पर कब्जा की थी। लेकिन 1989 से अब तक कांग्रेस विधायकों की संख्या दहाई में ही सिमट कर रह गयी है। वर्श 1989 के चुनाव में कांग्रेस 27 प्रतिशत मत लेकर 94 सीटें ही बचा पायी। 1991 के चुनाव में कांग्रेस 17 प्रतिशत वोट लेकर 46 सीटों में सिमट गयी।

इसी तरह 1996 में 15 प्रतिशत मत और 28 सीटें, 2002 में नौ प्रतिशत वोट एवं 25 सीटें ही जीत पायी। इसी तरह 2007 के चुनाव में कांग्रेस आठ प्रतिशत लेकर 22 सीटें तथा 2012 के चुनाव में 11 प्रतिशत मतों के साथ 28 सीट ही जीत सकी।

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