सड़क पर उतरे साहित्‍यकार, ‘अवॉर्ड वापसी’ पर आमने-सामने लेखक

नई दिल्ली| देश के कई नामचीन लेखकों ने आज देश में बढ़ती असहिष्णुता के खिलाफ शांतिपूर्ण मार्च किया। देशभर से करीब 100 लेखक मंडी हाउस में श्रीराम सेंटर के पास एकत्र हुए और वहां से साहित्य अकादमी तक मार्च किया। खास बात यह है कि एक तरफ घटती असहनशीलता का विरोध कर रहे साहित्यकार हैं तो दूसरी ओर इस मुद्दे पर सम्मान लौटाने वाले लेखकों के विरोध में भी कई लेखक प्रदर्शन कर रहे हैं।

लेखकों ने कहा कि उनका यह प्रदर्शन असामाजाकि घटनाओं को लेकर केंद्र सरकार के आंखें मूंदे रहने के खिलाफ उनके आक्रोश को दर्शाने के लिए है। साथ ही वे इस प्रदर्शन के जरिये साहित्यकारों पर बढ़ते हमलों के प्रति अकादमी का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं।

उन पर बढ़ते हमलों के खिलाफ कानून पारित किया जाय: प्रदर्शन में शामिल एक लेखक ने कहा, देश में वर्तमान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाया जा रहा है। इन दिनों देश में जो कुछ भी हो रहा है, उससे अल्पसंख्यक और अनुसूचित जाति के लोग असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। उन्होंने आगे कहा, सरकार को इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए। साहित्य अकादमी को भी सरकार पर दबाव डालना चाहिए और लेखकों पर बढ़ते हमलों के खिलाफ कानून पारित करने चाहिए।

प्रसिद्ध लेखक कलबुर्गी की हत्या से नाराज: कन्नड़ लेखक कलबुर्गी की हत्या के बाद से लेखकों का एक समूह सरकार से नाराज है। लेखकों का मानना है कि मौजूदा सरकार के सत्ता में आने के बाद से देश में ऐसा माहौल बना है, जिसमें बेबाक़ लिखना संभव नहीं है। हाल फिलहाल में हुई कुछ घटनाओं से आहत होकर 40 से ज्यादा साहित्यकार अपना साहित्य अकादमी अवॉर्ड लौटा चुके हैं।

साहित्य अकादमी की हुई अहम बैठक: इसी दौरान आज साहित्य अकादमी ने एक अहम बैठक बुलाई है। बैठक में अकादमी की ओर से आगे की रणनीति पर चर्चा की जाएगी। कुछ लेखकों ने साहित्य अकादमी की चुप्पी पर भी सवाल उठाए हैं।

सम्मान लौटाने वाले लेखकों के विरोध में भी प्रदर्शन: वहीं सम्मान लौटाने वाले लेखकों के विरोध में भी साहित्यकारों का एक तबका प्रदर्शन कर रहा है। इनका मानना है कि लेखकों को यूं सम्मान नहीं लौटाना चाहिए।

अरुण जेटली ने उठाए थे सवाल: देश में बढ़ती सांप्रदायिकता के विरोध में साहित्यकारों के पुरस्कार लौटाने पर केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने सवाल उठाए थे। अपने फेसबुक पेज पर जेटली ने सवालिया लहज़े में लिखा था कि यह विरोध सचमुच का है या गढ़ा हुआ? क्या ये वैचारिक असहनशीलता का मामला नहीं है?

उन्होंने यह भी लिखा था कि कई ऐसे लेखक हुए जिनका झुकाव वाम और नेहरू विचारधारा के प्रति रहा। पुरानी सरकारों के समय उन्हें सम्मान मिला। इनमें से कई ने मोदी जी के खिलाफ उस वक्त भी आवाज उठाई थी जब वह गुजरात के मुख्यमंत्री थे। जब केंद्र में मोदी सरकार बनी तो ऐसे लेखकों की बेचैनी बढ़ गई, जिन्हें पुरानी व्यवस्था में सरंक्षण मिला हुआ था।

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