चौधरी के जाने से बसपा में खास फर्क नहीं

मायावती इतना नहीं देती मौका कि वह उनके वोट बैंक को प्रभावित कर सके

लखनऊ। बसपा के कद्दावर नेताओं ने गिने जाने वाले पूर्व मंत्री आर के चौधरी के पार्टी छोडने से बीएसपी में कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। क्योंकि बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने किसी नेता का कद इतना नहीं बढाया कि वह उनके बेस वोट बैंक को प्रभावित कर सके।

इससे पहले भी पार्टी से कई बडे नेता जा चुके हैं या फिर उन्हें निकाल दिया गया लेकिन पार्टी के वोट बैंक एव बीएसपी मूवेंट को कोई प्रभावित नहीं कर सका।

चुनावी मौसम में नेताओं का दूसरे दलों आना -जाना कोई बडी बात नहीं है। इसी कडी में बसपा के महासचिव एवं प्रदेष सरकार के पूर्व मंत्री आर के चौधरी ने भी आज पार्टी से जय भीम कह दिया।

पार्टी छोडने के बाद उन्होंने वहीं आरोप लगाये जो पूर्व में बागी नेता लगाते रहे है। कि बसपा सुप्रीमो मायावती पैसे लेकर टिकट का वितरण करती है।

वहीं बसपा प्रदेष अध्यक्ष राम अचल राजभर ने भी आर के चौधरी पर जवाबी हमला करते हुए कहा कि वह स्वयं के लिए मोहनलालगंज सुरक्षित सीट से टिकट मांग रहे थे।

टिकट न मिलने से नाराज होकर पार्टी से चले गए। उन्होंने यह भी कह दिया कि आर के चौधरी दोबारा पार्टी में नहीं लिया जायेगा।
आर के चौधरी की बाते करें तो उन्होंने बसपा से ही राजनीति आरंभ की थी।

लेकिन 2001 में वह बसपा से नाराज होकर चले गए। तब भी उनके टिकट का ही मामला था। इसके बाद उन्होंने बहुजन क्रांति दल का गठन किया। पार्टी को चुनाव मैदान में उतारा लेकिन कामयाबी नहीं मिली।

इसके बाद गत लोकसभा चुनाव से पूर्व 2013 में वह पुनः बसपा में आ गए। करीब तीन साल आज फिर पार्टी से चले गए। चौधरी मूल रूप से फैजाबाद जनपद के रहने वाले एवं पासी समाज से ताल्लुक रखते है।

लेकिन उन्होंने फैजाबाद से कभी चुनाव नहीं लडा। वह अक्सर मोहनलालगंज क्षेत्र से विधानसभा एवं लोकसभा का चुनाव लड़ते रहे है। इसी क्षेत्र से वह दो बार विधायक निर्वाचित हो चुके है।

चौधरी के जनाधार की बात करे तो उनका प्रभाव मोहनलाल गंज क्षेत्र तक ही सीमित है। यही से चुनाव वह मजबूती से लडने के साथ चुनाव को प्रभावित कर सकते है। बाकी किसी क्षेत्र मंे इनके कहने से सजातीय वोट प्रभावित नहीं हो सकते।

क्योंकि बसपा सुप्रीमो मायावती पार्टी के किसी नेता को भी इतना मौका नहीं देती कि वह उनके बेस वोट बैंक को प्रभावित कर सके। इसीलिए बसपा के किसी नेता के जाने से पार्टी के जनाधार पर कोई खास प्रभाव नहीं पडता। क्योंकि पूर्व में भी बसपा से कई ताकतवर नेता जा चुके है अथवा निकाले जा चुके है।

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