भाजपा के लिए नुकसानदेह है जोड़ तोड़ की राजनीति

मिशन 2017 पर पड सकता है असर
लखनऊ। भारतीय जनता पार्टी का सबका साथ -सबका विकास का नारा भले ही हिट हो गया हो लेकिन उसे जोड तोड की राजनीति सूट नहीं करती। दिल्ली एवं बिहार में करारी शिकस्त खाने के बाद भी पार्टी बाज नहीं आ रही है।

इसी राजनीति के बदौलत भाजपा की यूपी के राज्यसभा एव ंविधान परिषद की दो दो सीटें जीतना चाह रही थी लेकिन वह पूरा नहीं हो पा रहा है। इसका खामियाजा पार्टी को मिशन 2017 में भुगतना पडेगा।
प्रदेश की विधानसभा में भाजपा विधायकों की संख्या 41 है। राज्यसभा के लिए 34 एव ंविधान परिषद के लिए 29 विधायकोे का समर्थन चाहिए।

इस तरह भाजपा को एक एक प्रत्याशी उतारना चाहिए था। लेकिन उसने जोड तोड की राजनीति को परवान चढाने के लिए भाजपा ने दो दो प्रत्याशी उतार दिए। लेकिन परिणाम आया तो उसके दोनेां अतिरिक्त प्रत्याशी की राह मुशकिल होती दिख रही है। सवाल यह है कि भाजपा ने जब दो दो प्रत्याशी उतारे तो इसके लिए पर्याप्त वोटों का इंतजाम क्यों नहीं किया। वहीं अपने एक विधायक को दूसरे दल में क्रास वोटिंग करने से नहीं रोक पायी।
नामांकन के बाद से भाजपा नेता लगातार विधायकों के साथ बैठक कर यह दावा करते आ रहे थे कि हमारे दोनेां प्रत्याशी जीतेंगे। इसके लिए पर्याप्त वोटों का इंतजाम कर लिया गया हैं। बडी मुष्किल से पार्टी दस वोटों का ही जुगाड कर पायी।

जबकि पार्टी इन्हें टिकट देने तक का वादा कर रही थी। यदि यही हाल रहा तो भाजपा का 265 प्लस सीटें आगामी विधानसभा चुनाव लाने का दावा धरा का धरा रह जायेगा। इसके लिए भाजपा को आत्मंथन कर जोड तोड की राजनीति से दूर रहना होगा।

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