खसरा में कारगर है होम्योपैथी दवाएं

लखनऊ। खसरा या मीजल्स बच्चों एव शिशुओं को होने वाली सामान्य छूत की बीमारी से हर साल लगभग 20 लाख बच्चे प्रभावित होते हैं जिसमें से लगभग दो से 5 लाख बच्चों की मौत का कारण भी खसरा बनता है।

कुछ लोग इसे गम्भीर नहीं मानते हैं परन्तु यदि इसका समय पर उपचार न किया जाये तो यह बच्चे की मौत का कारण भी बन सकता है।  खसरा रूबेला नामक वायरस द्वारा होता है।

यह वायरस स्वसन मार्ग द्वारा शरीर के अन्दर प्रवेश कर जाता है और बहुत तेजी से फैलने लगता है। खसरा बच्चों को ज्यादा होता है परन्तु यह किसी भी उम्र में हो सकता है। खसरा 5 वर्ष की अवस्था के पहले ज्यादा होता है परन्तु यह किसी भी उम्र में हो सकता है।

शिशुओं, कुपोषित बच्चों, टीका न लगे बच्चों एवं बडे़ परिवारों में इसके ज्यादा फैलने की सम्भावना रहती है। खसरा किसी भी मौसम में हो सकता है परन्तु इसके गर्मी में होने की सम्भावना ज्यादा रहती है।

खसरा दिखाई देने के तीन-चार दिन पहले बुखार के साथ कोराइजा (जुकाम) जेसे लक्षण जैसे नाक से पानी आना, आंख लाल होना, सिर दर्द, मिचली, तथा जोड़ों में दर्द होता है।

छोटे-छोटे नीलापन लिये हुए सफेद दाने जिन्हें कापलिक्स स्पाट कहते है, गालों के अन्दर वाले भाग में दिखाई देते है। तीन-चार दिन बाद बुखार कम हो जाता है तथा लाल दाने माथे, चेहरे से प्रारम्भ होकर सारे शरीर पर फैल जाते हैं उसके बाद धीरे-धीरे ऊपरी खाल साफ होकर पूर्ववत् होने लगती है।

खसरे की वजह से बच्चों में कान बहना, निमोनिया, दस्त, विटामिम ए की कमी, इन्सेफ्लाइटिस, ब्रांकाइटिस, लैरेन्जाइटिस, सांस लेने में तकलीफ, कुपोषण, चिड़चिड़ापन एवं कमजोरी जैसे गम्भीर विकार उत्पन्न होने की सम्भावना रहती है तथा खसरे के कारण बच्चों के मस्तिष्क का सही विकास नहीं हो पाता है।

यदि खसरे का सही समय से उपचार न किया जाय तो बच्चों की जान को खतरा उत्पन्न हो सकता है। खसरे से बचाव के लिए होम्योपैा चिकित्सक डा अनुरूद्ध वर्मा ने बताया कि बच्चे को खसरे की टीका जन्म के 1 से 12 माह के मध्य लगवा देना चाहिए तथा जब आस-पास के क्षेत्रों में खसरा फैल रहा हो तो खसरे से बचने के लिए मार्विलिनम-1000 या रसटाक्स-1000 अथवा पल्साटिला-1000 शक्ति की होम्योपैथिक औषधियां चिकित्सक की सलाह से देनी चाहिए।

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