मानव निर्मित त्रासदी का एक रुप, पुत्तिंगल मंदिर का अग्निकांड

नारायण नोनिय, कोल्लम। केरल के कोल्ल्म में पुत्तिंगल मंदिर में हुआ अग्निकांड़ इस बात का प्रमाण है कि नियम और कानून की आवहेलना व आदेशों का पालन न करना कितना जानलेवा साबित हो सकता है। अभी हाल ही में कोलकाता में निर्माणाधीन पुल के गिरने की त्रासदी देश देख चुका है। उस हादसे में पुल निर्माता कंपनी से लेकर सरकारीए प्रशासनिक अधिकारियों ने अपराधिक लापरवाही बरती। राजनीतिक दलों ने उन्हें शह दी और इसका खामियाजा मासूमों को अपनी जान देकर चुकाना पड़ा।

पश्चिम बंगाल के बाद अब केरल भयानक त्रासदी का शिकार हुआ है। पुत्तिंगल मंदिर में शनिवार रात नव वर्ष विशु के मौके पर आतिशबाजी हो रही थी। अगले दिन रविवार सुबह मौत बनकर लोगों पर पड़ी। यहॉ के मंदिरों में हर वर्ष श्रद्धालुओंए दर्शकों के मनोरंजन के लिए आतिशबाजी की जाती है। पिछले कई वर्षों से आतिशबाजी की जाती रही है। लोग समूह बनाकर मंदिर परिसर में आतिशबाजी करते है जिसकी रोशनी और धमक निर्णायकों को और प्रभावित करती है।

वह विजेता घोषित किया जाता है। इसके लिए प्रशासन से अनुमति लिया जाता है। किंतु इस बार सुरक्षा का हवाला देते हुए प्रशासन ने आतिशबाजी की अनुमति नही दी थी। इसके बावजूद रात 11 बजे से आतिशबाजी प्रारंभ हुई। पटाखे मंदिर परिसर में रखे गए थे। इस पर्व में केरल के लोगों द्वारा आतिशबाजी करना परंपरा के रूप में जाना जाता है। लोग अपने मनोरंजन के लिए आतिशबाजी में लगभग दो हजार करोड़ रूपये प्रति वर्ष खर्च कर देते हैं। यदि इतनी बड़ी राशी को जनहित या सूखा पीडि़त राज्यों में पानी की व्यवस्था को लेकर खर्च करते तो शायद कोई समाधान हो जाता।

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